गुलमोहर अमलतास कीछाँव में थी सुवास बिखरी बिखरे थे पत्ते सूखे मैं रहा था उसे निहार
Wednesday, June 1, 2011
Tuesday, May 24, 2011
आदमी की भूख
आदमी की भूख
आदमी ने खाए
पेड़ पोधे
पशु जंतु
और पक्षी
उनके अंडे
फिर भी रहा भूखे का भूखा
आदमी ने तोड़े पहाड़
उजड़े जंगल
बंधी नदिया
चीरा आकाश
फिर भी रहा निराश और हताश
आदमी का पेट छोटा
पर उसकी भूख बड़ी है
आदमी ने खाए
पेड़ पोधे
पशु जंतु
और पक्षी
उनके अंडे
फिर भी रहा भूखे का भूखा
आदमी ने तोड़े पहाड़
उजड़े जंगल
बंधी नदिया
चीरा आकाश
फिर भी रहा निराश और हताश
आदमी का पेट छोटा
पर उसकी भूख बड़ी है
Monday, April 25, 2011
भ्रष्ट जनतंत्र
शराब की बोतलों के
बदले में लोग
अपनी बेचते नहीं वोट
बेचते हैं अपने अपनी सोच
अपने अधिकार अपना स्वत्व
अपनी लोकतान्त्रिक अस्मिता
भ्रष्ट जनतंत्र
स्वयं से शापित जनतंत्र
सदियों से अकर्मण्यता
की चादर ओढ़े
कब होगी क्रांति
कब जागेंगे लोग
करेगा कौन दुस्साहस
मनो चूहों की सभा में
सवाल उठा है आज
की बिल्ली के गले में
घंटी बंधेगा कौन?
Labels:
क्रांति,
भ्रष्टाचार
Sunday, April 24, 2011
युग का दीपक
वह था मर्द जो अंतिम क्षण तक अड़ा रहा
वह था सिंह जो उस वेदी पर खड़ा रहा
बलिदान का क्षण वह अनोखा
वो वीर फंदे को चूम रहा था
चमक उठा मस्तक
दमक रहा मुख उज्जवल था
वह तूफ़ान सैलाब नसों मैं
दिल मैं भाव वासंती था
देखा न देखा ऐसा यह वीरों का वसंत
मर मिटने की यह भावना
ये अनुराग ये प्रेम महान
उन्नत होती संस्कृति तुमसे
तुम्हारा सदा रहे दिनमान
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