Tuesday, November 1, 2011

गुलमोहर

गुलमोहर अमलतास कीछाँव में थी सुवास बिखरी बिखरे थे पत्ते सूखे मैं रहा था उसे निहार

Wednesday, June 1, 2011

हिमाद्री शेषाद्री



हिमाद्री शेषाद्री 
कुरुमलुनम
करता  कलरव 
पवन  जहां पर 
नील  देश के उस कुमार की 
उमंग जगा कर मन मैं आता 
राग अरुण प्राची के पट नीरव
वह  श्यामल घन 
घनघोर बना 
शंकित करता  मन 
यह आती जो वह फुहार 
शीतल तन शीतल मन 
शीतल जन जीवन जग का
यह ज्योति  प्रफुल्ल बना जाती है 
यह करके चेतन 
शोभाचार बने ये 
हरित त्रिन गुल्म
   
 
 

Tuesday, May 24, 2011

आदमी की भूख

आदमी की भूख
आदमी ने खाए
पेड़ पोधे
पशु जंतु
और पक्षी
उनके अंडे
फिर भी रहा भूखे का भूखा
आदमी ने तोड़े पहाड़
उजड़े जंगल
बंधी नदिया
चीरा आकाश
फिर भी रहा निराश और हताश
आदमी का पेट छोटा
पर उसकी भूख बड़ी है

Monday, April 25, 2011


ONE EARTH ONE NATION


भ्रष्ट जनतंत्र

शराब की बोतलों के
बदले में लोग
अपनी बेचते नहीं वोट
बेचते हैं अपने अपनी सोच
अपने अधिकार अपना स्वत्व
अपनी लोकतान्त्रिक अस्मिता 
भ्रष्ट जनतंत्र
स्वयं से शापित जनतंत्र
सदियों से अकर्मण्यता
की चादर ओढ़े
कब होगी क्रांति
कब जागेंगे लोग
करेगा कौन दुस्साहस
मनो चूहों की सभा में
सवाल उठा है आज
की बिल्ली के गले में
घंटी बंधेगा कौन?

युग प्रवर्तन

तोड़ भाग्य की बेड़ियों को
मोड़ कर काल का प्रवाह
सुन हुंकार उस महाकाल की
आज बना तू उज्जवल राह
क्षीण रूग्ण अब नहीं टिकेगा
प्रवर्तन चक्र अब नहीं रुकेगा
बनाता चल राह धीर 
अनवरत बढ़ता चल वीर
कालचक्रव्युह का भेदन कर
तम का सीना चीर
न चुको ये समय है युग प्रवर्तन का
हे मृत्युंजय ! न रुको वीर !



Sunday, April 24, 2011

युग का दीपक

वह था मर्द जो अंतिम क्षण तक अड़ा रहा
वह था सिंह जो उस वेदी पर खड़ा रहा 
बलिदान का  क्षण वह अनोखा 
वो वीर फंदे को चूम रहा था 
चमक उठा मस्तक 
दमक रहा मुख उज्जवल था 
वह तूफ़ान सैलाब नसों मैं 
दिल मैं भाव वासंती था
देखा न देखा ऐसा यह वीरों का वसंत
मर मिटने की यह भावना
ये अनुराग ये प्रेम महान
उन्नत होती संस्कृति तुमसे
तुम्हारा सदा रहे दिनमान